ल्हासा की ल्हासा की ओर (ल्हासा की ओर,, क्षितिज भाग 1 कक्षा 9 )


वाह नेट से हटाने का प्रमुख रास्ता है। फ्री कल एडवर्ड का रास्ता जब नहीं खुला था। तो नेपाल ही हिंदुस्तान की भी चीजें इस रास्ते तिब्बत जाया करती थी। यह व्यापारी ही नहीं रहने का बाहर। इसलिए जगह-जगह फौजी चौकिया और किले बन गई जिनमें कभी इन पलटन रहा करते थे। आजकल बहुत से हो जी मकान गिर चुके हैं। दुर्ग के किसी भाग में जहां किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है। वहां घर कुछ आवाज दिखाई पड़ते हैं। ऐसा ही परिस्थिति एक चीनी किला था। हम वहां चाय पीने के लिए ठहरे तिब्बत में यात्रियों के लिए बहुत सी तकलीफ भीहै और कुछ हराम की बातें ही वहां जाती पाती छुआछूत को लोग चोरी के डर से घर के अंदर नहीं आने देते हैं। नहीं तो आप बिल्कुल घर के भीतर चले जा सकते हैं। चाहे आप बिल्कुल अपरिचित हो तब भी घर की बहू या शाम को अपनी डोली में से चाय दे सकते हैं वह आपके लिए उसे पका देगी मक्खन और सोडा नमक दे दीजिए वह चाय जोड़ी में कूटकर उसे दूध वाली चाय के रंग की बना के मिट्टी के टोटी दार बर्तन में रखकर आपको दे देंगे यदि बैठक की जगह चूल्हे से दूर है और आपको डर है कि सारा मक्खन आपकी चाय नहीं पड़ेगा। तो आप खुद जाकर थोड़ी में चाय मक्खन ला ला सकते हैं चाय कारण तैयार हो जाने पर फिर नमक मक्खन डालने की जरूरत होती है।

       प्रति व्यक्ति चीनी किले से जब हम चल चलने लगते हैं तो एक आदमी राह दारी मांगने आया हमने वह दोनों चिट्टे उसे दे दिए शायद इसी दिन हम 400000 के पहले की आखिरी गांव में पहुंच गए यहां भी सुमति के जान पहचान के आदमी थे और भीख मांगे रहते भी ठहरने के लिए अच्छी जगह मिली 5 साल बाद हम इसी रास्ते लौटे थे और भीख मांगे नहीं एक भद्र यात्री के वेश में घोड़ा पर सवार होकर आए थे किंतु उस वक्त किसी ने हमें रहने के लिए जगह नहीं दी और हम गांव के एक सबसे गरीब झोपड़े में ठहरे थे बहुत कुछ लोग कि उस वक्त की मनो विधि पर ही निर्भर हैं खासकर शाम के वक्त झाड़ पीकर बहुत कम होश हवास को दुरुस्त रहते हैं।
     अब हमें सबसे विकट डांडा थोड़ा पार करना था डांडी तिब्बत में सबसे खतरे की जगह है 16 70000 फीट की ऊंचाई होने के कारण उनके दोनों तरफ मिलो तक कोई गांव गिरा नहीं होते हैं नदियां के मोड़ और पहाड़ों के कोणों के कारण बहुत दूर तक आदमी को देखा नहीं जा सकता दांतों के लिए यही सबसे अच्छी जगह है तिब्बत में गांव में आकर खून हो जाए तब भी खूनी को सजा भी मिल सकती है लेकिन इन निर्जन स्थानों में मरे हुए आदमियों के लिए कोई परवाह नहीं करता सरकार खुफिया विभाग और पुलिस पर उतना खर्च नहीं करती है और वहां गवाह भी तो नहीं मिल सकता डकैत पहिले आदमी को मार डालते हैं उसके उसके बाद देखते हैं कि कुछ पैसा है कि नहीं हथियार का कानून रहने के कारण यहां लाठी की तरह लोग पिस्तौल बंदूक लिए फिरते हैं डाकू यदि जान से ना मारे तो खुद उसे अपने प्राणों का खतरा है गांव में हमें मालूम हुआ कि पिछले ही साल खोड़ला के पास खून हो गया शायद खून की हम इतनी परवाह नहीं करते क्योंकि हम भीख मांगे थे और जहां कहीं वैसी सूरत देखते हैं टोपी उतार जीभ निकाल कूची कूची एक पैसा करते भीख मांगने लगते हैं लेकिन पहाड़ की ऊंची चढ़ाई थी पीठ पर सामान लादकर कैसे चलते और अगला 16 17 मिल से कम नहीं था मैंने सुमति से कहा कि यहां के लड़कोर तक के लिए दो घोड़े कर लो सामान भी रख लेंगे और चढ़े चलेंगे।

        दूसरे दिन हम घोड़े पर सवार होकर ऊपर की ओर चले डंडे से पहले एक जगह चाय पी और दोपहर के वक्त झंडे के ऊपर जा पहुंचे। हम समुद्र तल से 17 18 फीट ऊंचे खड़े थे हमारी दक्षिण तरफ पूरब से पश्चिम की ओर हिमालय के हजारों श्वेत शिखर चले गए थे बेटे की ओर दिखने वाले पहाड़ बिल्कुल नंगे थे। ना वहां बर्फ की सफेदी थी। ना ही किसी तरह की हरियाली उत्तर की तरह बहुत कम बर्फ वाली चोटियां दिखाई पड़ती थी। सर्वोच्च स्थान पर डंडे के देवता का स्थान था जो पत्थरों के ढेर जानवर की सीखो और रंग-बिरंगे कपड़े की झंडू से सजाया गया था। अब हम बराबर उतराई पर चलना था। चढ़ाई तो कुछ दूर थोड़ी मुश्किल थी लेकिन उतराई बिल्कुल नहीं शायद 21 और सवार साथी हमारे साथ चल रहे थे। मेरा घोड़ा कुछ धीमे चलने लगा मैंने समझा की चढ़ाई की थकावट के कारण ऐसा कर रहा है। और उसे मारना नहीं चाहिए था। धीरे-धीरे वह बहुत पिछड़ गया और मैं दैनिक तो स्थानों की तरह अपने घोड़े पर झूमता हुआ चलता जा रहा था। जान नहीं पड़ता था। कि घोड़ा आगे जा रहा है। या पीछे अब मैं जोर देने लगता तो वह और सुस्त पड़ जाता एक जगह दो रास्ते फूट रहे थे। मैं बायका रास्ता ले मिल ढेर मेल चल गया। आगे एक घर मैं पूछने के के लिए पता लगाया कि लड़कों और लड़कों का रास्ता दाहिने वाला था। फिर लौटकर उसी को पकड़ा 4:05 बजे के करीब मैं गांव से मिल भर पर था तो सुमति  इंतजार करते हुए। मिले मंगोलो का मुंह वैसे ही लाल होता है। और अब तो वह पूरे गुस्से में थे। उन्होंने कहा मैंने दो टोकरी कंडे फॉर डाले तीन तीन बार चाय को गर्म पिलाया मैंने बहुत नरमी से जवाब दिया‌ लेकिन मेरा कसूर नहीं है। मित्र देख नहीं रहे हो कैसा घोड़ा मुझे मिला है। तो रात तक पहुंचने की उम्मीद रखना था खैर सुमति को जितनी जल्दी गुस्सा आता था। उतनी ही जल्दी गुस्सा ठंडा भी हो जाता था लड़कों और में वह एक अच्छी जगह पर ठहर रेट है। यहां भी उनके अच्छे जजमान थे। पिछले चाय सत्तू खाया गया रात को आराम फरमाया गया।
    अब हम पिंडली के विशाल मैदान में थे। जो पहाड़ों से घिरा टापू सा मालूम होता था। जिसमें दूर एक छोटी-सी पहाड़ी मैदान के भीतर दिखाई पड़ती है। उसी पहाड़ी का नाम है किंडली समाधि गिरी आस-पास के गांव में भी सुमति के कितने ही जजमान थे कपड़े की पतली पतली चीनी वासियों के गंदे खत्म नहीं हो सकते हैं। क्योंकि बोधगया से लाइक कपड़े के खत्म हो जाने पर किसी कपड़े से बोधगया का गेंडा बना लेते थे। वह अपने जजमान के पास जाना चाहते थे। मैंने सोचा या तो हफ्ता भर उधर ही भगा देगा। मैंने उनसे कहा कि जिस गांव में ठहरना है। वही भले ही गड़े बांट दो मगर आस-पास के गांव में मत जाओ इसके लिए मैं तुम्हें सलाह पहुंचकर रुपए दे दूंगा सुमति ने स्वीकार किया दूसरे दिन हमने भरिया ढूंढने की कोशिश की लेकिन कोई ना मिला सवेरे ही चल दिए तो अच्छा था। लेकिन अब 12:00 बजे की तेज धूप में चलना पड़ रहा था। दीपक की धूप भी बहुत कड़ी मालूम होती है। यथा पिथोड़े से भी मोटी कपड़े से सिरको ढक लें तो गर्मी खत्म हो जाती है। आप 2:00 बजे सूरज की ओर मुंह करके चल रहे हैं। ललाट धूप से चल रहा है और पीछे का कंधा बर्फ हो रहा है। फिर हमने पीठ पर अपनी अपनी चीजें लादी डंडा हाथ में लिया। और चल पड़े सुमित ने परिचित टंगरी में भी थे। लेकिन वह एक और जजमान से मिलना चाहता था। इसलिए आदमी मिलने का बहाना कर से कर विवाह की ओर चलने के लिए कहा तिब्बत की जमीन बहुत अधिक छोटी बड़ी जागीरदारों से बटी है इस जगीरो का बहुत ज्यादा ही सा मठों के साथ में है। अपनी अपनी जागीर में हर एक जमींदार कुछ खेती खुद भी करता है । जिसके लिए मजदूर बेगार में मिल जाते हैं खेती का इंतजाम देखने के लिए वहां कोई भिक्षुक भेजा जाता है। जो जागीर के आदमी के लिए राजा से कम नहीं शेखर की खेती में मुखिया बड़े भद्र पुरुष थे। वह बहुत प्रेम से मिले हालांकि उस वक्त मेरा भैंस ऐसा नहीं था। कि उन्हें कुछ भी ख्याल करना चाहिए था। यहां एक अच्छा मंदिर था जिसमें कंजूस की हस्तलिखित 103 पोतिया रखी गई थी। मेरा आसन भी वही लगा वह बड़े मोटे कागज पर अच्छे अक्षरों में लिखी गई थी। 11 पोथी 15 15 शेर से कम नहीं रही होगी। सुमति ने फिर आसपास अपने जवानों के पास जाने के बारे में पूछा मैं अब पुस्तकें के भीतर था। इसलिए मैंने उन्हें जाने के लिए कह दिया। दूसरे दिन वह आए मैंने समझा था दो-तीन दिन लगेंगे लेकिन वह उसी दोपहर बाद चले आए टिहरी गांव वहां से बहुत दूर नहीं था। हमने अपना अपना ही पीठ पर उठाया और बिच्छू नाम से से विदाई लेकर चल पड़े।
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