चींटी और झिंगुर की हिन्दी कहानी


एक बेवकूफ युवा झींगुर आदि था गान का
घन और चमकते धर्म और बसंत के महीनों में
लगा शिकायत करने जब उसने कि घर पर
उसकी अलमारी खा ली थी, और सर्दी आ गई थी।

           एक टुकड़ा ना मिलने वाला था
           बर्फ से ढके मैदान पर
            एक फूल भी ना देख सका वह
            ना एक पत्ता पेड़ पर
`ओह! क्या होगा, झिंगुर ने कहा, मेरा?`

अंत में भूख और आकाश ने साहसी  बना दिया
नीला होते हुए और कांपते हुए सर्दी से
क्या हुआ एक कंजूस चिट्टी के पास
 देखने यह कि वह जीवित रहे, वह उसे देगा
बारिश से असारा 
और पेट भरने को अनाज
वह केवल उधार लेना चाहता था
वह उसे अगले दिन वापस कर देगा
अगर नहीं मिला तो वह मर जाएगा भूख और दुख से।


कहां चिट्ठी ने झिंगुर से, में आपकी सेवक और मित्र हूं,
पर हम चीटियां कभी उधार नहीं करती, हम चीटियां कभी देती नहीं है
पर बताओ मुझे, प्यारे झींगुर, क्या आप अपने पास रखा नहीं कुछ
जब मौसम सुहाना गर्म था?'झींगुर ने कहा, 'मैंने नहीं!


     मेरा दिल, इतना हल्का था
    कि मैंने दिन-रात गाया
    कि सारी प्रकृति प्रशन नजर आती थी।
    'आपने गाया, श्रीमान, आप कहते हैं?
"जाओ तब, चींटी ने कहा, और नाच कर सर्दी को भगा दो।"

समाप्त करते हुए, उसने जल्दी से झंझरी उठाया
और दरवाजे से निकल गया बेचारा छोटा सा देंगे
लोग इसे कल्पित कथा कहते हैं। मैं इसे सत्य करता हूं
कुछ झींगुर के चार पैर होते हैं, और कुछ कह दो।